Wednesday, December 26, 2018

राहुल को अखिलेश का बड़ा झटका, KCR के फेडरल फ्रंट का किया समर्थन

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की विपक्षी एकता की कोशिशों को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बड़ा झटका दिया है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी दलों के फेडरल फ्रंट का अखिलेश यादव ने समर्थन किया है. हालांकि सपा अध्यक्ष ने कहा कि बुधवार को केसीआर से मुलाकात होनी संभव नहीं है.

अखिलेश ने कहा कि फेडरल फ्रंट बनाने के लिए तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर से मुलाकात करेंगे. मध्य प्रदेश में सपा के जीते इकलौते विधायक को मंत्री न बनाए जाने से अखिलेश नाराज हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस का भी धन्यवाद. एमपी में हमारे एक मात्र विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया है ऐसे में अब हमारा रास्ता साफ है.

अखिलेश यादव ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन जरूर होगा. बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए सभी दलों को एक साथ आना चाहिए. उन्होंने कहा कि युवा कुम्भ में रोजगार की बात होती तो अच्छा होता. अखिलेश ने कहा कि लखनऊ के लोक भवन में अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा लगाना ठीक है, लेकिन हमारी सरकार आएगी तो हम भी एक मूर्ति लगाएंगे .

केसीआर कांग्रेस को दरकिनार कर अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती के साथ गठबंधन की कवायद में जुटे हैं. अब केसीआर के फेडरल फ्रंट को समर्थन देना कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए दूसरा बड़ा झटका माना जा रहा है.

ये कहा जा सकता है कि 1994 की घटनाओं के तार उनके बचपन से ही जुड़ने शुरू हो गए थे. यही वो दौर था जब रवांडा पर बेल्जियम का शासन हुआ और इस ओपनिवेशिक शक्ति ने रवांडा के लोगों को स्पष्ट रूप से बंटे हुए समूहों में बांट दिया. पहचान पत्र जारी करके लोगों को बता दिया गया कि वो हूतू हैं या तुत्सी.

कारूहिंबी का परिवार हूतू था और ये समुदाय रवांडा में बहुसंख्यक था. लेकिन अल्पसंख्यक तुत्सी समुदाय के लोगों को उच्च वर्गीय समझा जाता था और यही वजह थी कि बेल्जियम के शासनकाल में नौकरियों और व्यापार में इसी समूह का बोलबाला था.

इस बंटवारे ने दोनों समूहों के बीच तनाव भी पैदा किया. 1959 में कारुहिंबी युवा ही थीं जब तुत्सी राजा किगेरी पंचम और उनके दसियों हज़ार तुत्सी समर्थकों को पड़ोसी उगांडा में शरण लेनी पड़ी. ये रवांडा में हुई हूती क्रांति के बाद की बात है.

जब 1994 में हूतू राष्ट्रपति जुवेनाल हेब्यारिमाना का विमान मार गिरा दिए जाने के बाद तुत्सियों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हुई तो ये पहली बार नहीं था जब कारूहिंबी ने इस तरह की हिंसा देखी थी.

Monday, December 17, 2018

गहलोत ने मुख्यमंत्री और पायलट ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, 12 दलों के नेता पहुंचे

अशोक गहलोत ने सोमवार को राजस्थान के 22वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल कल्याण सिंह ने उन्हें शपथ दिलाई। वे तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने हैं। उनके साथ सचिन पायलट ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ के दौरान सचिन लाल पगड़ी बांधे हुए थे। समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौजूद रहे। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी शामिल हुईं। शपथ ग्रहण में संभावित महागठबंधन के 12 दलों के नेता नजर आए।

सोनिया नहीं पहुंचीं

गहलोत-पायलट के शपथ ग्रहण में कांग्रेस से राहुल, मनमोहन के अलावा मल्लिकार्जुन खड़गे, पुड्डुचेरी के सीएम वी नारायणसामी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कुमारी शैलजा, जतिन प्रसाद, नवजोत सिंह सिद्धू मौजूद थे। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी मौजूद नहीं थीं।

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे निजी वजहों से शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो पाए। अखिलेश ने ट्वीट करके बताया कि उनके प्रतिनिधि के तौर पर विधायक राजेश कुमार पहुंचे।

अशोक गहलोत 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। तब उनकी उम्र 47 थी। इसके बाद 2008 में उन्हें सत्ता की कमान मिली। तब वे 57 साल के थे। उनकी अभी उम्र 67 साल है।

राजस्थान के नए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट भी जयपुर में शपथ लेने के बाद कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ भोपाल पहुंचे। कमलनाथ के शपथ ग्रहण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, राजीव शुक्ला, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, मंत्री डी शिवकुमार, पुडुचेरी के मुख्यमंत्री नारायणसामी, आनंद शर्मा, राज बब्बर, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा, उनके बेटे और सांसद दीपेंदर हुड्डा, पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, पंजाब में मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू, विवेक तन्खा मौजूद थे।

मंत्रिमंडल में ऐसे हो सकता है क्षेत्रीय संतुलन

कमलनाथ मंत्रिमंडल के गठन में वरिष्ठता, क्षेत्रीय संतुलन और जातिगत समीकरण का ध्यान रखा जा सकता है। उप मुख्यमंत्री को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। 20 से ज्यादा विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने पर मंथन चल रहा है।

Wednesday, December 5, 2018

फिल्मी पर्दे से लेकर राजनीति में रही जयललिता की धाक, 5 बार बनी थीं CM

आज तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की दूसरी पुण्यतिथि है. दो साल पहले जयललिता ने 5 दिसंबर को अपोलो अस्पताल में आखिरी सांस ली थी. सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद उन्हें 22 सितंबर को अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था. इस मौके पर तमिलनाडु मेंकई कार्यक्रमों को आयोजन किया जा रहा है और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है. 

जयललिता का अभिनेत्री से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा. एक विद्यार्थी के तौर पर भी पढ़ाई में उनकी काफी रुचि रही और 15 साल की उम्र में फिल्मी करियर शुरू करने वाली जयललिता एक सुप्रसिद्ध तमिल एक्ट्रेस बनीं. उसके बाद उन्होंने तमिल सिनेमा केसुपरस्टार रहे एमजीआर के साथ कई फिल्में की.

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हालांकि, बाद में जयललिता ने फिल्मी दुनिया को अलविदा कह कर 1982 में राजनीति जगत में कदम रखा. कहा जाता है कि अंग्रेजी में उनकी मजबूती को देखकर एमजीआर उनको राजनीति में लेकर आए थे. एम करुणानिधि की पार्टी द्रमुक से टूटने के बाद एमजीआर ने अन्नाद्रमुक का गठनकिया. साल 1983 में एमजीआर ने जयललिता को पार्टी का सचिव नियुक्त किया और राज्यसभा के लिए मनोनीत भी किया.

इस बीच, जयललिता और एमजीआर के बीच मतभेद की खबरें भी आईं, लेकिन जयललिता ने 1984 में पार्टी के प्रचार अभियान का नेतृत्व किया. 1987 में रामचंद्रन की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक दो टुकड़ों में बंट गई. एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता दोनों के पक्ष मेंसमर्थक-कार्यकर्ता बंट चुके थे. 1988 में जानकी के 21 दिन तक मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया. वहीं, अगले चुनाव में हार के बाद जानकी ने इस्तीफा दे दिया और जयललिता को आगे आने का मौका मिला.

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जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाने के बाद जयललिता पहली बार साल 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं. कई हार और जीत के सफर के साथ उन्होंने पांच बार प्रदेश की कमान संभाली. आय से अधिक संपत्ति रखने के लिए जयललिता पर केस चला जिसमें वो दोषी भी पाई गईं. आखिरकार27 सितंबर 2014 को बेंगलुरु की एक अदालत ने जयललिता को चार साल कैद की सजा सुनाई गई.